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घाटमपुर : माता कुष्मांडा के चरणों से जल टपकता है और ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति की आंख की रोशनी कम हो या बिल्कुल न हो तो वह यहां आकर नवरात्र पर आकर जल आंख पर डाले तो उसकी रोशनी वापस आ जाती है। बताते चलें कि कानपुर शहर से 40 किमी की दूरी पर स्थित एक एतिहासिक मां दुर्गा के चौथे स्वरुप माता कुष्मांडा देवी का मंदिर है। यह मंदिर कानपुर सागर हाईवे पर पड़ने वाली तहसील घाटमपुर में स्थित है। नवरात्र पर्व पर मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की सारी दुनिया में पूजा होती है । परन्तु देश में उनका इकलौता मंदिर घाटमपुर में है। इतिहासकारों के अनुसार मां कूष्मांडा का यह मंदिर मराठा शैली में बना है और इसमें स्थापित मूर्तियां संभवत: दूसरी से दसवीं शताब्दी के मध्य की हैं। नवरात्र पर्व के अवसर पर मां कुष्मांडा देवी के दर्शन के लिए देश-विदेश से भक्त आते हैं। माता कुष्मांडा के चरणों से जल टपकता है और ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति की आंख की रोशनी कम हो या बिल्कुल न हो तो वह यहां आकर नवरात्र पर आकर जल आंख पर डाले तो उसकी रोशनी वापस आ जाती है। इसका प्रमाण भी कई देवी भक्तों ने दिया जिनकी आंख की गई रोशनी वापस आई है।

पिंडी के रुप में लेटी मां कुष्मांडा

1000 वर्ष पुराना मंदिर हैl मां कुष्मांडा देवी इस प्राचीन व भव्य मंदिर में लेटी हुई मुद्रा में है। यहां मां कुष्मांडा एक पिंडी के स्वरूप में लेटी हैं, जिससे लगातर पानी रिसता रहता है। आज तक वैज्ञानिक भी इस रहस्य का पता नहीं लगा पाए कि ये जल कहां से आता है। माता के मंदिर कोई पंड़ित पूजा नहीं करवाता। यहां नवरात्र हो या अन्य दिन सिर्फ माली ही पूजा- अर्चना करते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त यहां माता को चुनरी, ध्वजा, नारियल और घंटा चढ़ाने के साथ ही भीगे चने अर्पण करते हैं।

कुड़हा नामक व्यक्ति को दिया था दर्शन

मंदिर के राजू माली ने बताया कि यहां पहले घना जंगल था। इसी गांव का कुड़हा नामक ग्वाला गाएं चराने जाता था। शाम के समय जब वह दूध निकालने जाता तो गाय एक बूंद भी दूध नहीं देती। ग्वाले ने इस बात की निगरानी की। रात में ग्वाले को मां ने स्वप्न में दर्शन दिए। वह गाय को लेकर गया तभी एक स्थान पर गाय के आंचल से दूध की धारा निकलने लगी। ग्वाले ने उस स्थान की खुदवाई करवाई। वहां मां कूष्मांडा देवी की पिंडी निकली। गांव वालों ने उसी स्थान पर मां की पिंडी स्थापित कर दी अौर उसमें से निकलने वाले जल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने लगे। चरवाहे कुड़हा के नाम पर मां कुष्मांडा का एक नाम कुड़हा देवी भी है। स्थानीय लोग मां को इसी नाम से पुकारते हैं।

कारोबारी ने करवाया था मंदिर का निर्माण

राजू माली के मुताबिक घाटमपुर के कारोबारी चंदीदीन भुर्जी का बेटा बीमार रहता था | डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर लिए | कारोबारी मां के दरबार पर आया और मां के चरणों से रिसने जल बेटे को पूरे नवरात्र पर पिलाया | इसके अलावा बगल में बने तालाब में स्नान करवाता था ।  मां की कृपा से कारोबारी का बेटा ठीक हो गया तो उसने खुश होकर 1890 को मां के भव्य  मंदिर का निर्माण कराया था। सितंबर 1988 से मंदिर में मां कूष्मांडा की अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित हो रही है। सूर्योदय से पूर्व नहा कर 6 माह तक इस जल का प्रयोग किया जाए तो उसकी बीमारी शत प्रतिशत ठीक हो जाएगी। कहा जाता है कि इसके लिए बहुत नियम की जरूरत होती हैl मंदिर के समीप ही दो तालाब बने हुए हैं। यह तालाब कभी नहीं सुखते हैं। भक्त एक तालाब में स्नान करने के पश्चात दूसरे कुंड से जल लेकर माता को अर्पित करते हैं। नवरात्र की चतुर्थी पर माता

कूष्मांडा देवी के मंदिर परिसर में दीपदान महोत्सव काफी सुंदर होता है। दीपदान करने के लिए आस-पास के गांव के लोग आते हैं।

माता सती का चौथा अंश गिरा था घाटमपुर में

माता कुष्मांडा की कहानी शिव महापुराण के अनुसार,भगवान शंकर की पत्नी सती के मायके में उनके पिता राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था। इसमें सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया गया था। लेकिन शंकर भगवान को निमंत्रण नहीं दिया गया था। माता सती भगवान शंकर की मर्जी के खिलाफ उस यज्ञ में शामिल हो गईं। माता सती के पिता ने भगवान शंकर को भला-बुरा कहा था,जिससे अक्रोसित होकर माता सती ने यज्ञ में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। माता सती के अलग-अलग स्थानों में नौ अंश गिरे थे। माना जाता है कि चौथा अंश घाटमपुर में गिरा था। तब से ही यहां माता कुष्मांडा विराजमान हैं।

आज होगा भव्य दीपदान का आयोजन

नवरात्र के चौथे  दिन मां कुष्मांडा मंदिर में भव्य दीपदान का आयोजन किया जाता है। शाम ढलते ही परिसर व सरोवरों में एक साथ हजारों दीपों का प्रज्वलन परिसर की शोभा में चार चांद लगाता है। दीपदान करने के लिए तहसील क्षेत्र के साथ ही अन्य जिलों व प्रदेशों के लोग मौजूद रहते हैं। मां कुष्मांडा के दर्शन करने वाले भक्त कानपुर सेंट्रल से रेल मार्ग के जरिए भी जा सकते हैं। ट्रेन से 45 मिनट में घाटमपुर पहुंचने के बाद भक्त पैदल चल कर जा सकते हैं। वहीं अगर कोई बस या अन्य वाहन से कुष्मांडा माता के दर्शन के लिए आना चाहे तो वह कानपुर – सागर हाईवे के जरिए पहुंच सकता है। नौबस्ता से महज 35 किमी की दूरी पर हाईवे किनारे मां का भव्य मंदिर बना है।

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