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ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत मनाया जाता है, जो इस बार 27 जून को है। वट यानी बरगद के वृक्ष को आयुर्वेद के अनुसार परिवार का वैद्य माना जाता है। पंचवटी में पांच वृक्षों- वट, अशोक, पीपल, बेल और हरड़ को ही शामिल किया जाता है। महिलाओं से संबंधित बीमारियों के लिए तो यह कल्पवृक्ष है। इसके नीचे संत गण तपस्या करते हैं। प्रयाग स्थित अक्षय वट और बिहार के बोधिवृक्ष, जहां महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, से सब परिचित हैं।

वट सावित्री व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को तो दक्षिण *भारत में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। दोनों में सावित्री की ही पूजा होती है। माह भी एक ही है, बस तिथि का अंतर है। एक अमावस्या को, तो एक पूर्णिमा को मनाया जाता है।

‘जल ही जीवन है’ इस बात की सबसे अधिक सार्थकता ज्येष्ठ माह में महसूस होती है। गर्मियों में पानी की होती कमी के बीच हमारे बुजुर्गों ने ऐसे व्रतों के द्वारा पानी का महत्व समझाने का प्रयास किया है। गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी व्रत आदि भी ज्येष्ठ माह में ही आते हैं। पौराणिक ग्रंथों- स्कंद पुराण व भविष्योत्तर पुराण में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में रहने वाली महिलाएं ज्येष्ठ पूर्णिमा को ही वट सावित्री व्रत रखती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से यह व्रत शुरू हो जाता है। सभी महिलाएं यह व्रत विधि-विधान से रखती हैं। इसमें व्रत के अंतर्गत तीन दिन का उपवास रखा जाता है। लेकिन यह तभी संभव है, जब आपका शरीर निरोगी हो। शरीर कमजोर हो तो त्रयोदशी को रात्रि भोजन, चतुर्दशी को अयाचित और पूर्णिमा को उपवास रख कर व्रत सम्पन्न करें।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि के अनुसार ही वट पूर्णिमा का व्रत किया जाता है। वट वृक्ष के नीचे ही महिलाएं सत्यवान-सावित्री की कथा सुनती हैं। साथ ही पूजा के लिए दो बांस की टोकरियां लेकर एक में सात प्रकार का अनाज, कपड़े के दो टुकड़ों से ढक कर रखा जाता है। दूसरी टोकरी में मां सावित्री की प्रतिमा रख कर धूप, दीप, अक्षत, कुमकुम, मौली आदि से पूजा की जाती है। सावित्री की पूजा कर वट वृक्ष की सात परिक्रमा करते हुए मौली के धागे से उसे बांधा जाता है। सावित्री को अर्घ्य भी देना जरूरी है। फिर श्रद्धा के साथ वस्त्र मिठाई-फल दक्षिणा आदि भी दिया जाता है।

Input ayushi

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