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जिन्ना ने क्यों कहा, संविधान कांग्रेस द्वारा बनाया गया तो देश में मुस्लिमों के सपने चकनाचूर हो जाएंगे  गुलाम भारत के लिए अपने खुद के संविधान के बारे में सोचना भी बेहद मुश्किल काम था लेकिन बहुत जद्दोजहद के बाद इस मुहिम को आखिरकार सफलता मिली और भारत का संविधान, खुद भारतीयों द्वारा बनाया गया

राज्यसभा टीवी की एक डॉक्युमेंट्री कहती है, भारत का अपना संविधान बनाने की कोशिश 1857 के दौरान क्रांतिकारियों ने भी खूब की लेकिन विद्रोह समाप्त हो गया और यह काम अधूरा रह गया। 1914 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय संविधान पेश किया। उस वक्त उन्हें टरकाते हुए अंग्रेजों ने कहा, युद्ध के बाद हम इस संविधान को मान लेंगे, लेकिन उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। असल में वे हमारे लिए अपने हिसाब से संविधान बनाना चाहते थे, जो भारतीयों को मंजूर नहीं था।

शुरुआत हुई ‘कैबिनेट मिशन’ से 
खैर, काफी जद्दोजहद के बाद ब्रिटिश सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री एकसाथ भारत भेजे गए और यह कहलाया ‘कैबिनेट मिशन’। शिमला में बैठक की शुरुआत हुई और कांग्रेस की तरफ से उनके अध्यक्ष मौलाना आजाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, खान अब्दुल गफ्फार खां इस बैठक में मौजूद थे। वहीं मुस्लिम लीग से लियाकत अली खां, जिन्ना, नवाब इस्माइल खां और सरदार नीशतर तथा रजवाड़ों की तरफ से नवाब मोहम्मद हमीदुल्लाह शामिल हुए थे। बैठक के दौरान…

जिन्ना: अगर संविधान कांग्रेस द्वारा बनाया गया तो देश में मुस्लिमों के सपने चकनाचूर हो जाएंगे, इसलिए हम मुस्लिमों को अपना अलग संविधान बनाना चाहिए।

सरदार वल्लभ भाई पटेल: यह स्वीकार नहीं किया जा सकता। हम यहां संयुक्त भारत का भविष्य तय करने के लिए इकट्ठा हुए हैं, भारत के टुकड़े करने के लिए नहीं। और, अगर इस मिशन का यह मकसद है तो हमारा यहां कोई काम नहीं है।

सर स्टैफर्ड क्रिप्स (ब्रिटिश कैबिनेट मंत्री): 
इस परिस्थिति में मुझे यह बैठक रद्द करनी होगी और यह बैठक बिना कोई निष्कर्ष निकले रद्द हो गई। कैबिनेट मिशन असफल रहा।

संविधान सभा का मिलना एक बार फिर तय हुआ 

कुछ समय बाद भारतीयों द्वारा किसी बड़े ऐक्शन के डर से ब्रिटिश सरकार तुरंत मान गई और पंडित नेहरू के भारत लौटते ही तीन दिन के भीतर भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का मिलना तय हो गया। सभा के दौरान पंडित नेहरू ने अपने प्रस्ताव में भारत की अक्षुणता, अखंडता और स्वायत्तता से लेकर नए भारत में सबकी समानता और एकता तक की बात रखी।

सभा के कुछ वक्त बाद… 
पंडित नेहरू : चर्चिल साहब की हिमाकत देखी आपने मौलाना! हाउस ऑफ कॉमन्स में जनाब फरमाते हैं कि कांग्रेस पार्टी द्वारा बहुमत के बल पर हिंदू राज चलाने की कोशिश भारत की एकता के लिए खतरा बन सकती है। यह एकता सतही है, जिसे ब्रिटिश सरकार ने सालों यहां राज करने के दौरान बोने की कोशिश की। किसी बाहर वाले की अगुवाई में एकता का यह बीज नष्ट हो जाएगा।
मौलाना (हंसते हुए): बकवास!

संविधान सभा में एक बार फिर… 
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी : ब्रिटिश सरकार मुस्लिम लीग को भड़का रही है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर : आज हम सभी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर विभाजित हैं। हम सभी के अलग-अलग खेमे हैं। मैं खुद भी शायद ऐसे ही किसी एक कैंप का लीडर हूं, लेकिन समय और परिस्थितियां हों तो कोई इस देश को एक होने से नहीं रोक सकता।

संविधान सभा का पांचवां सत्र शुरू हुआ, एक बहुत ही ऐतिहासिक दिन। 15 अगस्त, 1947। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन के बाद।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद : आज वर्षों के संघर्ष और जद्दोजहद के बाद हम अपने देश के शासन की बागडोर अपने हाथों में लेने जा रहे हैं। हमें उस परमपिता परमात्मा को याद करना चाहिए जो मनुष्यों और देशों के भाग्य को बनाता है।

पंडित नेहरू : चंद मिनटों में यह असेंबली पूरी तरह से आजाद असेंबली हो जाएगी और नुमाइंदगी करेगी एक आजाद मुल्क की। उस वक्त जब बहुत से देश सो रहे होंगे, आजाद भारत जागेगा, आजादी की सांस लेगा।

इसी सेशन में संविधान को लिखित रूप देने की दिशा में काम शुरू किया गया। इस दौरान हमारे संविधान में बुनियादी हकों के अलावा राजनीति के निदेशक तत्वों को भी शामिल किया गया। संविधान बनाने वाले अल्पसंख्यकों को लेकर बहुत सजग थे इसलिए उन्हें ध्यान में रखकर संविधान तैयार किया गया। एक-एक शब्द लिखने से पहले उसके सभी अर्थों पर चर्चा की गई। इस दौरान भारत के सभी रजवाड़ों की रियासत को समाप्त करते हुए उन्हें भारत का हिस्सा बना देने का प्रस्ताव भी था। संविधान के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पास कर दिया गया, जिसका जिन्ना और रजवाड़ों ने विरोध किया था।

अनेक प्रकार के कानून बनने के बाद अब बात आई कि देश की भाषा कौन सी होगी? बहस छिड़ गई। पंडित नेहरू चाहते थे कि हिन्दुस्तानी ही राष्ट्र भाषा बने और महात्मा गांधी ने भी अपनी मृत्यु से पहले एक हरिजन नामक अखबार में यह कहते हुए अपनी इच्छा जाहिर की थी कि हिन्दुस्तान की भाषा पूरे देश की राज्य भाषा के शब्दों से मिलाकर बने। कांग्रेस कमिटी की एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दुस्तानी होगी, तो कइयों ने कहा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी होगी। मतदान हुआ और बड़ी ही मुश्किल से हिन्दी भाषा और संख्याओं के कानून को पारित कर लिया गया। अथक मेहनत, कई संशोधन, अनेक कठिनाइयों का सामना करके, अनेक बहसों के बाद पूरे 2 साल 11 महीने 17 दिन बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनकी कमिटी ने एक बहुत ही बड़ा काम कर दिखाया था। अब हमारे पास हमारा खुद का संविधान था, हमारे खुद के नियम व कानून थे, और सही मायने में हमारा देश भी आजाद हो चुका था।

24 जनवरी 1950 को इस संविधान पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हुए और नए गणतंत्र देश के सबसे पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का चुनाव हुआ। साथ ही इसी दिन जन गण मन को हमारे देश का राष्ट्रगान और वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत के लिए अपनाया गया। इस तरह से आखिरकार 26 जनवरी 1950 को वो दिन भी आ ही गया, जब हमारे भारतवर्ष को भारतीयों द्वारा भारत के लिए बनाया गया हमारा खुद का संविधान प्राप्त व लागू हुआ।

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