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सिकंदराराऊ : हुसैनपुर कोडरापुल पर श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर चित्रण किया ।
भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती , विश्व शांति एवं भाईचारे के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य महंत धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज कथा के पंचम दिवस में हम ब्रज की माधुरी मय लीलाओं का श्रवण करेंगे। ये भगवत कृपा ही है जिसकी बदौलत अखिल ब्रह्माण्ड के नायक एक मात्र जगत के पालन हार जब हम पर कृपा करते हैं तो मन में बहुत ही सुन्दर संकल्प आते है ।भगवान की कथा सुनना इससे श्रेष्ठ संकल्प और क्या हो सकता है। गवान के भजन का आश्रय लेना ही पड़ेगा। केवल कृष्ण का नाम ,गोविन्द का नाम तुम्हारा मंगल करेगा।
महंत धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी महाराज ने कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा कि जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योंकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आंखें फेर लीं क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पूतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पूतना का वध कर उसका कल्याण किया। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं।
कथा व्यास पुष्पेन्द्र शास्त्री ने कहा कि भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वाल वालों के साथ खेलना है ,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं ,वे मेरे कितने प्रिय हैं।भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी कें रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
भागवत कथा में भाईचारा सेवा समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हरपाल सिंह यादव, समाजसेविका सुनीता यादव, गौरव बघेल, सृष्टि यादव, शौभा यादव,परी यादव,चन्द्रवती यादव,रवि यादव, तारा यादव, उपासना यादव, कमलेश यादव, सुरती यादव,गौरी यादव, पीयूष यादव, रुद्र यादव,आरव यादव, विनय यादव, मोहित यादव, सुनील, रामसेवक यादव, विजय यादव , हरेंद्र यादव,रामप्रकाश यादव, संजीव यादव, राजेंद्र यादव गजेन्द्र, रविन्द्र यादव, राजेश यादव, आशीष यादव, कोमल सिंह पुंडीर, भारत सिंह कुशवाह, राजवीर कश्यप, मनोज, रमेश कुमार,अजब सिंह यादव, हरप्यारी , केशव पुजारी, जीतू यादव, रामसेवक यादव आदि मौजूद रहे।

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