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सादाबाद : अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर संस्कार जागृति मिशन की अध्यक्ष एवं सनातन धर्म की वरिष्ठ प्रचारिका प्रोफेसर डॉ. अर्चना प्रिय आर्य ने योग के आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का एक दिव्य एवं वैज्ञानिक माध्यम है। उन्होंने बताया कि संस्कृत की ‘युज’ धातु से निर्मित ‘योग’ शब्द का अर्थ है ‘जुड़ना’ और ‘समाधि’। मनुष्य जब अपने अंतर्मन से जुड़ता है, तभी वह आत्मिक शांति और समाधि की अवस्था को प्राप्त कर सकता है। योग मन, शरीर और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का एक प्रभावी साधन है, जो व्यक्ति को ईश्वर के ज्ञान एवं आत्मबोध की ओर अग्रसर करता है। प्रो. डॉ. अर्चना प्रिय आर्य ने कहा कि योग केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाने वाली जीवनशैली है। यह आत्म-अनुशासन, आत्म-साक्षात्कार और सकारात्मक जीवन दृष्टि का आधार है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दृढ़ संकल्प, श्रद्धा, प्रेम, उत्साह और संयम के साथ योग को अपनाता है, वही वास्तविक अर्थों में योगी कहलाता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में योग का विशेष महत्व रहा है। योग व्यक्ति को शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से सशक्त और आध्यात्मिक रूप से जागरूक बनाता है। अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार पर नियंत्रण स्थापित करना ही योग का वास्तविक स्वरूप है। अंत में उन्होंने सभी नागरिकों से आह्वान किया कि वे योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। नियमित योगाभ्यास न केवल स्वस्थ जीवन का आधार है, बल्कि तनावमुक्त, सकारात्मक और संतुलित जीवन जीने का भी प्रभावी मार्ग है।
INPUT – KANHAIYA LAL











