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हसायन हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह समय अपने दिवंगत पूर्वजों यानी पितरों को स्मरण करने, उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा से जुड़ा है। जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा। इस दौरान लोग अपने परिवार में दिवंगत हुए पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करते हैं।
क्यों किया जाता है श्राद्ध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के माध्यम से पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट की जाती है। तर्पण में जल अर्पित किया जाता है तथा श्राद्ध में भोजन बनाकर ब्राह्मण, जरूरतमंदों और पशु-पक्षियों को भोजन कराने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे पितरों को तृप्ति और शांति प्राप्त होती है तथा परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।
श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पूर्वजों को याद करने की परंपरा भी है। हिंदू धर्म में इसे पितृ ऋण चुकाने का माध्यम माना गया है। यही कारण है कि पितृ पक्ष के दौरान लोग श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। पितरों के लिए क्या किया जाता है?
पितृ पक्ष में लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करते हैं। कई परिवारों में कौआ, गाय, कुत्ते और जरूरतमंदों को भोजन कराने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता में इन कार्यों को पितरों तक श्रद्धा पहुंचाने का प्रतीक माना जाता है।

INPUT – YATENDRA PRATAP SINGH