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मुम्बई : पिछले 6दशक से ज्यादा समय से हर शादी में बैंड-बाजा पर बजने वाला सबसे लोकप्रिय धुन है-ये देश है,वीर जवानों का…।यह गाना हिन्दी फिल्म इतिहास की सार्वकालिक लोकप्रिय और श्रेष्ठ फिल्म बीआर चोपड़ा की ‘नया दौर’ का है।इस फिल्म के हर गानों ने धूम मचाई थी और आज भी उतने ही कर्णप्रिय और लोकप्रिय हैं।इस फिल्म के संगीतकार थे-ओपी नैयर।

नया दौर ही नहीं-आर-पार,तुमसा नहीं देखा,कश्मीर की कली,मेरे सनम,प्राण जाए पर वचन ना जाए,बहारें फिर भी आयेंगी,संबंध,सोने की चिड़िया,एक मुसाफिर एक हसीना,फिर वो ही दिल लाया हूँ,सी. आई. डी,
सावन की घटा,किस्मत,फागुन,हावड़ा ब्रिज,ये रात फिर ना आयेगी,मि. & मिसेज 55 सहित लगभग छःदर्जन से ज्यादा फिल्मों की एक लम्बी सूची है,जिसकी धुनें ओपी नैयर ने तैयार की।

बाबूजी धीरे चलना प्यार में ज़रा संभलना,ये लो मैं हारी पिया,कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना,ले के पहला पहला प्यार,ये देश है वीर जवानों का,उड़े जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी,रेशमी सलवार कुर्ता जाली का,इक परदेसी मेरा दिल ले गया,दीवाना हुआ बादल,इशारों इशारों में दिल लेने वाले,ये चांद-सा रोशन चेहरा,चल अकेला,ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अंधेरा ना घबराइये,मेरा बाबू छैल छबीला-जैसे लोकप्रिय गानों की संगीत रचना से संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे ओपी नैयर।कभी उनको ‘रिद्मकिंग’कहा गया तो कभी’ताल का बादशाह.’
ओपी नैयर ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी. उस दौर में लोगों को यकीन दिलाना मुश्किल था कि एक इंसान जिसने न स्कूल की पढ़ाई ढंग से की,न संगीत की-वह‘तू है मेरा प्रेम देवता(कल्पना)’ जैसे गीत को पूरी समझ के साथ कैसे कंपोज कर सकता है.इस गाने के बोल शुद्ध हिंदी में है और धुन शास्त्रीय संगीत पर है.

आकाशवाणी के लिए लोकप्रिय गायक सीएच आत्मा के लिए गीत बनाया, जिसके बोल थे ‘प्रीतम आन मिलो’.‘प्रीतम आन मिलो’ के साथ ओपी नैयर भी मकबूल हुए.ओपी नैयर अपने जमाने के सबसे महंगे संगीतकार थे.

‘कनीज'(1949)में नैयर साहब ने बैकग्राउंड स्कोर दिया.1952 में आई फिल्मों ‘आसमान’ और ‘छम छमा छम’में उन्होंने पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत दिया था.बतौर संगीतकार ‘आसमान’ नैयर की पहली फिल्म मानी जाती है.

ओपी नैयर की अच्छी परिचितों में गीता दत्त भी थीं. उन्होंने उन्हें गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी. इस बात का अंदाजा शायद नैयर को भी नहीं होगा कि यह मुलाकात उनको क्या से क्या बनाने जा रही है.गुरुदत्त ने उन्हें ‘आर-पार (1954)’का संगीत रचने की जिम्मेदारी दी.उनकी अगली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस 55 (1955)’का संगीत भी ओपी नैयर ने दिया. इन दोनों फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें हिंदी फिल्म जगत में स्थापित कर दिया.

ओपी नैयर से जुड़ी एक मजेदार बात है कि संगीत के साथ उनकी ‘प्रयोगधर्मिता’ भले ही श्रोताओं को लुभाती हो लेकिन 1950 में आकाशवाणी ने उनके गानों पर प्रतिबंध लगा दिया था. तर्क था कि इन गानों को संगीत की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

नैयर जिद्दी भी खूब थे.तभी तो लता मंगेशकर जैसी गायिका से कभी न गवाने की जिद पर आखिर तक डटे रहे. लता और ओपी नैयर के बीच इस बेरुखी के पीछे भी एक किस्सा है. हुआ यूं कि ओपी नैयर की पहली फिल्म‘आसमान’का एक गाना सहनायिका पर फिल्माया जाना था.नैयर यह गाना लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे.लता मंगेशकर ने सहनायिका के लिए गाना अपना अपमान समझा और मना कर दिया.बस यही बात नैयर साहब को चुभ गई और उन्होंने लता जी से तौबा कर ली.आशा भोंसले और गीता दत्त से ही अपने सारे(करीब 150) गाने गवाए.
एक बार मध्य प्रदेश सरकार ने नैयर को एक लाख रुपए का लता मंगेशकर पुरस्कार देने का फ़ैसला किया. जब राज्य सरकार का एक अधिकारी इस संबंध में उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके मुंह पर ही कहा कि लता मंगेशकर के नाम पर पुरस्कार लेने के बारे में दूर,वो उसके बारे में सोचना भी पसंद नहीं करेंगें.
जो विद्रोही स्वभाव,जिद और अक्खड़पन नैयर को बचपन में ही मिल गया था वह आखिरी वक्त तक उनके साथ रहा।28 जनवरी,2007 को उनकी मृत्यु हुई थी,लेकिन जाते-जाते भी उन्होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी.अंत्येष्टि में परिवार का कोई व्यक्ति शामिल न हो, यही आखिरी जिद थी.जो उनके परिवार वालों ने ससम्मान पूरी की.

आशा भोसले को आशा भोसले बनाने का श्रेय ओपी नैयर को दिया जाता है.‘सीआईडी’में ओपी नैयर ने आशा भोंसले को पहली बार मौका दिया और इस जोड़ी ने बाद में कई हिट गाने दिए.उन्होंने आशा की आवाज़ के वैविध्य और रेंज का पूरा फ़ायदा उठाया. उनके रूमानी संबंधों ने भी उनके गानों में एक ख़ास किस्म की चिंगारी भर दी.उनकी प्रोफ़ेशनल रिलेशनशिप रोमांस में बदल गई और 1958से 1972 तक यानी 14 सालों तक उनका साथ रहा.ओपी नैयर की कैडलक कार में घूमने वाली आशा भोंसले ने 1972 में अपने जीवन के इस संगीतमय अध्याय को ख़त्म करने का फ़ैसला किया.आशा भोसले से अनबन के कारण 1974में दोनों ने साथ काम न करने का फैसला किया.उसके बाद नैयर का करियर ढलान पर आ गया.उन्होंने दिलराज कौर, वाणी जयराम,कविता कृष्णमूर्ति सबसे गवाया,पर गीतों में ‘वो’ बात नहीं आ पाई.

नैयर साहब ने एक पत्रकार से कहा था-‘ये तो सुना था कि लंव इज़ ब्लाइंड,लेकिन मेरे मामले में लव ब्लाइंड के अलावा डेफ़ यानी बहरा भी था।क्योंकि, आशा की आवाज़ के अलावा मैं और कोई आवाज़ सुन नहीं पाता था.

ओपी नैयर और आशा भोसले ने अंतिम बार ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ फ़िल्म के लिए साथ काम किया,जिसके एक गीत के लिए 1973 का पुरस्कार मिला.आशा उस समारोह में नहीं गईं.ओपी नैयर ने उनकी तरफ़ से ट्रॉफ़ी ली.नैयर साहब अपनी कार से वापस लौट रहे थे.उनकी कार में गीतकार एसएच बिहारी बैठे हुए थे.सड़क पर सन्नाटा था.अचानक नैयर साहब ने कार का शीशा नीचा किया और वो ट्राफ़ी फेंक दी जो एक खंबे से टकराई.आखिरी आवाज़ उन्होंने सुनी,जैसे कोई चीज़ चूरचूर हो जाती है.उन्होंने बगल में बैठे हुए बिहारी साहब से कहा कि ये जो आपने ट्रॉफ़ी टूटने की आवाज़ सुनी,इसके साथ ही आशा इज़ आउट ऑफ़ माई लाइफ़… फ़ॉर एवर…”

रिपोर्ट : पंकज कुमार श्रीवास्तव