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हाथरस : चैत्र महीने के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को शनिवार तथा शतभिषा नक्षत्र का एक साथ योग होने पर एक अत्यंत महान और पावन योग बनता है जिसको वारुणी पर्व के नाम से जानते हैं,माह,नक्षत्र,दिन और योग के द्वारा अलग अलग यह तीन प्रकार से बनता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शतभिषा नक्षत्र होने के कारण वारुणी योग बनता है,कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन शतभिषा नक्षत्र का होना और शनिवार का दिन होने पर महावारुणी योग बनता है तथा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शतभिषा नक्षत्र, शनिवार और शुभ नामक योग हो तो महामहावारुणी योग बनता है। क्योंकि इस पर्व से जुड़े योग प्रतिवर्ष नहीं मिलते इसलिए इसका महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है। वारुणी पर्व के विषय में यह जानकारी शहर के प्रमुख ज्योतिर्विद और सनातन धर्म गुरु स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने दी। उन्होंने कहा कि अनेकों वर्षों बाद इस बार 6 अप्रैल को चैत्र कृष्ण त्रयोदशी शनिवार है तथा शतभिषा नक्षत्र होने के कारण यह महान पर्व प्राप्त हुआ है। इस पर्व में जो भी भक्त गंगा स्नान करते हैं उनके तीन करोड़ पीढ़ी का उद्धार हो जाता है तथा एक करोड़ सूर्य ग्रहण में स्नान करने का पुण्य फल प्राप्त होता है।
वारुणी पर्व के मुहूर्त और महत्त्व के विषय में उन्होंने बताया कि वारुणी योग एक अत्यंत ही शुभ एवं उत्तम गति प्रदान करने वाला समय होता है, 06 अप्रैल शनिवार को प्रातः 10:17 से सांय 03:38 बजे तक यह योग रहेगा यह अत्यंत पावन शुभ मुहूर्त भी है जो अबूझ मुहूर्त में भी गिना जाता है।इस योग के प्रत्येक क्षण पवित्रता से भरपूर और शुभ दायक माना गया है,धर्म सिंधु, काशी आदि ग्रंथों में भी इस पर्व का वर्णन देखने को मिलता है साथ ही विभिन्न भाषाओं में संपूर्ण भारत वर्ष में इस समय की शुभता का वर्णन देखने को मिलता है।
स्वामी जी के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में किया गया स्नान,दान एवं श्राद्ध कार्य अक्षय फल देने वाला होता है मान्यताओं के अनुसार सृष्टि चक्र अपने शुभ स्तर पर होता है,इसलिए इसे देवताओं के लिए भी असाध्य और कठिन बताया गया है क्योंकि उन्हें भी इस स्नान का फल लेने के लिए पृथ्वी पर आना पड़ता है।अतः वारुणी योग में सुख,स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए गंगा,यमुना या किसी पवित्र नदी, घाट या सरोवर इत्यादि में स्नान करना चाहिए,यदि संभव नही हो तो घर पर ही स्नान वाले जल में गंगा जल मिलाकर समस्त नक्षत्रों को स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिए उसके बाद भगवान शिव तथा विष्णु का पूजन करना चाहिए तथा तुलसी के समक्ष दीपक जलाकर धार्मिक ग्रंथों गीता, भागवत, रामायण इत्यादि का पाठ करना चाहिए। साथ ही इस दिन व्रत करके रात्रि में तारों को अर्ध्य देकर भोजन करने की परंपरा भी है।दीप दान, हवन, यज्ञ और विभिन्न अनुष्ठान आदि करने से पाप और ताप का शमन होता है।इस दिन किए जाने वाला अन्न,धन और वस्त्र दान का शुभता देने वाला है।

INPUT – VINAY CHATURVEDI

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