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दिल्ली : चाणक्यपुरी में सरदार पटेल मार्ग पर जंगल में करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर यह स्मारक स्थित है। इसे मालचा महल या मालचा विसदरी कहा जाता है। इसे फिरोजशाह तुगलक ने (1351-88) बनवाया था। तुगलक द्वारा बनवाई गई यह एक शिकारगाह है। इसमें तीन मुख्य कक्ष हैं। बीच वाला कक्ष बड़ा है। यह लगभग चौकोर है। तुगलक शिकार पर निकलने के समय इसका उपयोग करता था। इस महल को लेकर कहानी कुछ दिलचस्प है। अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने सत्ता से बेदखल कर दिया था। उन्हें कोलकाता जेल में डाल दिया गया। जहां उन्होंने अपने जीवन के आखिरी 26 साल गुजारे। जब 1947 में देश को आजादी मिली तब तक वाजिद अली शाह का खानदान इधर-उधर बिखर चुका था। बेगम विलायत महल 1970 करीब लोगों के सामने आईं। उनका दावा था कि वो अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की परपोती हैं। वह भारत सरकार से उन तमाम जायदाद के बदले मुआवजे की मांग कर रहीं थीं, जिसे भारत सरकार ने उनके दादा-परदादा से ज़ब्त कर लिया था। जब विलायत महल की मांगों पर कोई सुनवाई नहीं हुई तो एक दिन अचानक उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआइपी लाउंज को अपना घर बना लिया। 10 साल तक उन्हें वहां से हटाने की नाकाम कोशिशें होती रहीं। आख़िरकार सरकार ने उन्हें मालचा महल दे दिया। विलायत महल ने सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बेटे प्रिंस अली रजा और बेटी सकीना महल के साथ मालचा महल में आ गईं। वो अपने साथ आठ कुत्तों को भी लेकर आईं थीं। बस ये नाम का महल था, न तो इसमें बिजली थी, न पानी और न ही खिड़की-दरवाजे। जंगली जानवरों को रोकने के लिए इस महल में चारों ओर से लोहे की जालियां लगी थीं। बेगम विलायत महल और प्रिंस अली रजा के जीते जी यहां किसी को क़दम रखने की इजाज़त नहीं थी। वो आम लोगों के मिलना पसंद नहीं करते थे। न तो कोई वहां आता था और न ही वो कहीं जाते थे। महल के बाहर मोटे अक्षरों में लिखा था कि अनधिकृत प्रवेश करने पर गोली मार दी जाएगी। असल में ‘मालचा महल’ कोई महल नहीं, बल्कि एक शिकारगाह थी। तुगलक वंश के शासक फिरोज शाह तुगलक ने अपनी दिल्ली शासन से वक़्त 1325 में उसे तैयार करवाया था। उस दौर में दिल्ली में घने जंगल हुआ करते थे, और तुगलक भी शिकार का शौकीन था, इसलिए उसने तीन शिकारगाह तैयार किए। एक था ‘पीर ग़ालिब’, दूसरा ‘भूली भटियारी का महल’ और तीसरा ‘मालचा । एक बार शिकार के दौरान फिरोजशाह रास्ता भटक गया था और तब एक कबीले की बच्ची ने उसे रास्ता बतलाया था। कहते हैं तुगलक ने ये शिकारगाह उसके सम्मान में ही बनवाया था। ‘मालचा महल’ को पूर्व में ‘बिस्तदारी महल’ के नाम से भी जाना जाता था।
ये तो हुई ‘मालचा महल’ से जुड़ी बुनियादी जानकारी मगर जिस कहानी को सुन लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, वह इसके काफी बाद की है। असल में 1975-76 के वक्त दिल्ली ने एक बड़ी ही अजीबोगरीब घटना का सामना किया था, जिसने उस वक़्त न सिर्फ राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियाँ बटोरी थी। असल में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक मध्यम आयु की महिला अपने दो बच्चे (एक बेटा-एक बेटी), व 10 कुत्तों को लेकर आ गयी और फिर वहीं अपना डेरा जमा लिया। दिल्ली रेलवे स्टेशन की भागदौड़ के बीच प्लेटफॉर्म नम्बर 1 पर बैठी वह महिला बेहद इत्मीनान से थी, शांत और गम्भीर। बाद में पता चला कि वह महिला बेगम विलायत महल है जोकि अवध के भूतपूर्व नवाब वाजिद अली शाह की परपोती होने का दावा कर रही थी। ब्रिटिश साम्राज्य में अंग्रेजों ने नई नीति के तहत नवाबों से उनकी शक्ति व नवाबी छीन ली थी, जिसका शिकार वाजिद अली शाह को भी होना पड़ा था। इतने वर्षों बाद बेगम विलायत महल अपने दोनों बच्चों- राजकुमारी सकीना और राजकुमार अली रज़ा के साथ दिल्ली आई थी सरकार से अपनी पुरानी शक्ति व नवाबी माँगने और अभी उसका डेरा था नई दिल्ली का रेलवे स्टेशन  बेगम विलायत महल ने शुरू-शुरू में तो प्लेटफॉर्म पर ही धरना दिया, मगर फिर बाद में उठकर वेटिंग रूम में जम गई और फिर शुरू हुआ असली धरना। लोगों के लिए ये अचरज की बात थी, और जो उनकी कहानी सुनता, अचंभित हो जाता। कई बार तो पत्रकार भी आते और उनसे इंटरव्यू लेकर जाते। कुछ लोगों ने कोशिश की उन्हें हटाने की, मगर वह डटी रही। उन्होंने अपना धरना जारी रखा। और ये 9 साल तक चला। 9 साल तक बेगम विलायत महल ने अपने बच्चों- राजकुमारी सकीना और राजकुमार रज़ा के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में धरना दिया और तब जाकर 1984 की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप कर उनकी बात सुनने का फैसला किया। ये स्पष्ट था कि उन्हें वापस अवध की गद्दी तो नहीं मिलेगी, मगर रहने व गुजर-बसर करने के लिए वे दिल्ली की किसी पुरानी धरोहर को अपना ठिकाना बना सकती हैं। तब बेगम विलायत महल ने ‘मालचा महल’ में अपना डेरा जमाने का फैसला किया। बेगम विलायत खान ने ये जगह पसन्द की, और फिर अपने दोनों बच्चों, कुछ नौकर व 25 कुत्तों के साथ मई 1985 में मालचा महल आ गयीं। सदियों से वीरान पड़े मालचा महल में 1985 से लेकर 2017 तक बेगम विलायत महल के परिवार के सदस्य रहे, और अचरज की बात ये है कि उस जगह पर न तो बिजली की कोई व्यवस्था है, और न पानी की। तो अगले 30 से भी अधिक वर्षों तक कोई वहाँ कैसे रहा, ये खुद में एक रहस्य है। आज के दौर में हम कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसे रहने की, और वहाँ तथाकथित अवध के नवाब के वंशज 30 सालों तक साँपों, छिपकलियों व चमगादड़ों के बीच रहे। पहले नौकरों को जंगल से बाहर भेजा जाता था रेस्टोरेंट से खाना लाने के लिए, मगर बाद में खाना भी महल में ही बनना शुरू हो गया। उस परिवार ने खुद को बाहरी दुनिया से बिल्कुल ही काट लिया, और कोई उनके इस इलाके में न आये, इसकी सुनिश्चितता के लिए उन्होंने 25 कुत्तों को खुला छोड़ दिया। समय बीता, तो इस जगह से जुड़ा रहस्य और गहराने लगा। धीरे-धीरे सभी नौकर काम छोड़कर चले गए। कुत्तों की संख्या भी घटकर अब 10 पर आ गई। समय ने रहस्य का एक और पर्दा उसपर ढक दिया।

Input : desk

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